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उत्तराखंड में बड़े राजनीतिक बदलाव का साल, भाजपा और कांग्रेस ने किए कई परिवर्तन

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उत्तराखंड के लिए बड़े राजनीतिक बदलाव का साल, भाजपा और कांग्रेस ने किए कई परिवर्तन

उत्तराखंड में अब तक चार विधानसभा चुनाव हुए हैं और इस दौरान भाजपा तथा कांग्रेस को दो-दो बार सरकार बनाने का अवसर मिला है। यह बात अलग है कि इन चार सरकारों में राज्य को नौ मुख्यमंत्री मिल गए।

देहरादून,

उत्तराखंड की राजनीति के दृष्टिकोण से यह वर्ष भारी उथल-पुथल और बड़े बदलाव वाला रहा। वर्ष 2022 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए सत्तारूढ़ भाजपा हो या फिर विपक्ष कांग्रेस, दोनों ही दलों में इस वर्ष काफी कुछ बदला। भाजपा ने केवल चार महीने की अवधि में दो बार मुख्यमंत्री बदलने जैसा अप्रत्याशित कदम उठाया। यानी प्रदेश की जनता ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर इस साल तीन चेहरे देखे। साथ ही भाजपा ने चुनावी वर्ष में संगठन को और मजबूती देने के उद्देश्य से प्रदेश संगठन की कमान नए चेहरे को सौंप दी। उधर कांग्रेस में भी नेता विधायक दल और प्रदेश अध्यक्ष के रूप में इस वर्ष नए चेहरों को जिम्मेदारी दी गई।
त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के कारणों को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं रहीं, लेकिन पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया जाना उससे भी ज्यादा चौंकाने वाला रहा। हालांकि मुख्यमंत्री पद जैसी बड़ी जिम्मेदारी संभालते ही तीरथ सिंह रावत की शुरुआत डगमगा गई। विशेष कर अपने कुछ विवादास्पद बयानों के कारण वह देश में चर्चा में आ गए, जिसका नुकसान उन्हें उठाना पड़ा। उत्तराखंड भाजपा का गढ़ रहा है और पार्टी किसी भी स्थिति में यहां कमजोर नहीं पड़ना चाहती। पिछले दो लोकसभा चुनाव में पांचों सीटों पर जीत के साथ ही विधानसभा चुनाव में 70 सीटों में से 57 पर परचम फहराने वाली भाजपा अपने इसी प्रदर्शन को आगे भी जारी रखना चाहती है।

तिवारी के रिकार्ड की बराबरी करने से चूके त्रिवेंद्र 

नारायण दत्त तिवारी एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री रहे, जिन्होंने उत्तराखंड में अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूर्ण किया। इस वर्ष मार्च में त्रिवेंद्र सिंह रावत अपने चार साल का कार्यकाल पूर्ण होने पर राज्य स्तरीय समारोह की तैयारी कर रहे थे तो तब लगा कि तिवारी के बाद त्रिवेंद्र दूसरे मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, जो पूरे पांच साल मुख्यमंत्री रहेंगे, लेकिन चार वर्ष पूरे होने से कुछ ही दिन पहले उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा। चर्चा रही कि भाजपा नेतृत्व ने त्रिवेंद्र के नेतृत्व में लगभग चार साल चली प्रदेश सरकार के प्रति एंटी इनकंबेंसी को न्यून करने के लिए मुख्यमंत्री बदलने का फैसला किया। इसके साथ ही भाजपा ने संगठन के अध्यक्ष पद पर भी परिवर्तन का निर्णय लिया। त्रिवेंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों में शामिल रहे मदन कौशिक को संगठन की जिम्मेदारी सौंप दी गई। प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत को संगठन से सरकार में भेज मंत्री पद दिया गया।
उत्तराखंड में अब तक चार विधानसभा चुनाव हुए हैं और भाजपा तथा कांग्रेस को दो-दो बार सरकार बनाने का अवसर मिला। यह बात अलग है कि इन चार सरकारों में राज्य को नौ मुख्यमंत्री मिल गए। वर्ष 2002 में पहले विधानसभा चुनाव में सत्ता मिली कांग्रेस को और राज्य की पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री बने नारायण दत्त तिवारी। इससे पहले लगभग सवा साल की अंतरिम सरकार में भाजपा ने नित्यानंद स्वामी और भगत सिंह कोश्यारी के रूप में दो मुख्यमंत्री दिए थे

 कांग्रेस में हरीश रावत की सक्रियता ने बटोरी चर्चा 

उत्तराखंड में कांग्रेस ने भी इस साल कई बड़े बदलाव देखे। चुनावी साल होने के बावजूद पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत उत्तराखंड से ज्यादा पंजाब में सक्रियता को लेकर चर्चा में रहे। रावत ने पंजाब प्रभारी का पद छोड़ा तो कांग्रेस ने उन्हें उत्तराखंड में चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना दिया। रावत वैसे तो स्वयं को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसी बीच उत्तराखंड कांग्रेस विधायक दल की नेता डा. इंदिरा हृदयेश का निधन हो गया तो पार्टी के अंदरूनी समीकरण भी बदल गए। बदली परिस्थितियों में क्षेत्रीय और जातीय संतुलन साधने के लिए कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह को नेता विधायक दल का दायित्व सौंप कर गढ़वाल से गणोश गोदियाल को संगठन का मुखिया बना दिया। पंजाब के बाद हरीश रावत ने अध्यक्ष के साथ चार कार्यकारी अध्यक्ष का फामरूला उत्तराखंड में भी अपनाया। यह प्रयोग कितना सफल रहेगा, विधानसभा चुनाव के परिणाम से पता चलेगा।

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Author: News Aap Tak

Chief Editor News Aaptak Dehradun (Uttarakhand)

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